यह कविता आपको झंझकोर रखदेगी


जीते जी मरे भुखा प्यासा मरने पे पकवान परोस दीया

खुद मानव ही हैं दूसमन मानव का क्यु प्रकृती को दोश दीया 
नंगे बदन फीरता रहा ना तन ढकने को फटा पूराना पूर दीया ʼ सूला दीया जब अर्थि पे तो उसकी अर्थि को अनजानो ने भी चद्दर सूट उढाकर के रग रंगीली बना दीया
बेबस था लाचार था वो जो भूखा प्यासा  घूम रहा बस एक नीवाला मीलजाऐ वो हर दरवाजा  ताक रहा
नही मीली उसे एक भी रोटी  वो गाली खाकर सोगया 
नाजाने वो भगवा ह कैसा जो पत्थर पे पकवान चढे तो अती प्रसन्न जो होगया
जीस की बनाई रचना मे क्यो उसी का बनाया हर जीव जो दर्द का जीवन काट रहा 
कहा है वो मालीक जीसे हम कहे वीधाताʼ वो इन्साफ क्यो नही बाट रहा ढोंग और पाखंड करने वालों को तूम्हारा वो भगवान ही क्यों नही डाट रहा 
सूनता क्यो नही तेरा वीधाता क्यो नजरो से वो ना देख रहा  दरीन्दे कते रोज दरीन्दगी नारी को लाचार किया एक भर्स्टाचारी नेता ओर अफसरने खूब ही भ्र्स्टा चार कीया बेबस ओर लाचारो पे खुब ही अत्याचार किया फीरभी वो गुन्हगार तेरा क्यो मोज की जिन्दगी काट रहा 

नही मीला जवाब कोई यहा नही कोई विधाता है  छोडो अन्याय अत्याचार हे ईन्सान तू खूद ही ईश्वर तू खूद ही यहा वीधाताʼ है 


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