आखीर क्यो मारदेता है इन्सान इन्सान को

दील टूट सा जाता है मेरा जब कोई ईन्सान ईन्सान को मारदेते है
मै कह नही सकता उसे ईन्सान जो धर्मं की आड मे ईन्सानयत को मारदेता है
मै क्या धर्म कहूं उसे जिसके सूत्रधार ही नसलो मे जहर घोल देते है
सेकने को अपनी-अपनी रोटीया धर्म की आङ मे खून बहाने की ठान लेते है
दील टूट सा जाता है मेरा जब कोई ईन्सान ईन्सान को मारदेते है
यूही कह लेते है अपने को  महान दाडी मूछो की आङमे आतंक को पनाह देते है
करते है स्टेजो पे शब्द वाणी लोभ दीखा परमात्मा का बहन बेटी बहला फुसला कर अपने हव्स की प्यास बूझालेते है
वो धर्म ही क्या जिसके सूत्रधार ही ब्लात्कार को अंजाम देते है
दील टूट सा जाता है मेरा जब कोई ईन्सान ईन्सान को मारदेते है
क्या हिन्दू-मुस्लिम क्या सिख ईसाई है हम सभी है ईन्सन ओर आपस मे भाई भाई है हम सब मे है भग्वान बसा, ये नफरतें धर्म की किसने फैलाई है ये चंद पाख्णङ पे पलने वाला ने नफरत की आग जलाता है
दील टूट सा जाता है मेरा जब कोई ईन्सान ईन्सान को मार गिराता है

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