मजबूरी क्या होती है साहेब उन लोगों से पूछिये, जो दिन रात खून पसीना बाहा बाहा कर भी सिर्फ दो वक्त की रोटी जुटा पाते हैं।।
मजबूरी क्या होती है साहेब उन लोगों से पूछिये, जो दिन रात खून पसीना बाहा बाहा कर भी सिर्फ दो वक्त की रोटी जुटा पाते हैं।।उनके बच्चे क्या जाने शानो शौकत से रहना साहेब जो पैदा होते ही जमीन पर लिटा कर अपने मासूमों को कमाने दोवक्त की रोटी सड़कों पे निकल जाते हैं
होते हैं लाले पेट भरने के जिन लोगो को वो भला कैसे अपने बच्चों को पढ़ा लिखा पाते है
मजबूरी क्या होती है साहेब उन लोगों से पूछिये, जो दिन रात खून पसीना बाहा बाहा कर भी सिर्फ दो वक्त की रोटी जुटा पाते हैं।।
कह देते हैं अमीर घराने के लोग आरक्षण खत्म करदो जो मिलती है सुख सुविधा तुम लोगो को वो गरीब गहराने के बच्चो को कहा मिल पाती हैं
वो पढ़ ते है जलाकर लालटेन उन्हें महंगी कोचिंग कहा मिल पाती हैं
मजबूरी क्या होती है साहेब उन लोगों से पूछिये, जो दिन रात खून पसीना बाहा बाहा कर भी सिर्फ दो वक्त की रोटी जुटा पाते हैं।।
सरकारें भी होती हैं वोट लेने तक उनकी हिमाती वोट लेने के बाद क्या कोई सुविधा उन तक पहुंचाती हैं
जो मिलती हैं अमीरों को सरकारी सुविधा क्या कभी गरिबो को मिल पाती है
बदलते होंगे देश के अमीर लोगों के हालात सरकारों के सहयोग से गरीबों के मासूम बच्चे तो आज भी रोटी कपड़ा और मकान को तरस जाते हैं
होते हैं अरमान उनके भी कुछ बड़ा करने के पर उनके तो सपने तक भूखे पेट की वजह टूट जाते हैं
मजबूरी क्या होती है साहेब उन लोगों से पूछिये, जो दिन रात खून पसीना बाहा बाहा कर भी सिर्फ दो वक्त की रोटी जुटा पाते हैं।।
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