Mahngai महंगाई

 तुम क्या जानो महंगाई तुम्हे तो मांग कर खाना 

रहे तुम्हारी जेब जो खाली बस ग्रह दोष बतलाना है

महंगाई तो उनसे पूछो जिन्हे दो वक्त की रोटी खातिर पूरे दिन खून बहाना है

तुम क्या जानो महंगाई तुम्हे तो मांग कर खाना 

रहे तुम्हारी जेब जो खाली बस भूत प्रेत बतलाना है

फिश तुम्हारी फिक्ष नहीं तुम तो फिस बढ़ा दोगे पैदल तुम्हे क्यों जाना साहेब गाड़ी का रेट बतादो गे

तुम क्या जानो महंगाई तुम्हे तो मांग कर खाना 

उन से पूछो मंगाई जिन्हे गोबर कीच उठाना है सारा दिन ढो ढो कर के मेला साहेब बच्चो की भूख मिटाना है 

तुम क्या जानो महंगाई तुम्हे तो मांग कर खाना 

मेहनत तुम्हे नहीं करनी साहेब इसी मासूम जनता की जेब से चंदे के नाम से लाखों ठगते जाना है 

तुम क्या जानो महंगाई तुम्हे तो मांग कर खाना 

कभी आत्मा कभी भूत कभी खुद इश्वर नाराज बताना है किसी ओर की रोली चंदन से माथे में तिलक लगाना है हवन येज्ञ का ढोंग रचा लाखों का खर्च बताना हे 

तुम क्या जानो महंगाई तुम्हे तो मांग कर खाना 

महंगाई तो उनसे पूछो जिन्हे खेत में हल चलाना है 

दिन रात बहाकर खून पसीना जिन्हे निवाला खाना है 

मजदूर बाप को जवान बेटी का बियाह जिसे रचना सामाजिक कुरीतियों का सारा सामान जुटाना है  

तुम क्या जानो महंगाई तुम्हे तो मांग कर खाना 



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