प्रक्रती का कहर

सुनो इन्सानो अब अपने घरों मे ही रहो प्रक्रती ने नाराज गी जताई है
जरा सी  चूक से ही मीट सकती हैं मानव सभ्यता इस धरती से, एसी महामारी छाई है
बहोत की या दोहन प्रक्रती का साएद प्रक्रती ने बदले की आग जलाई है
आज नही आए वो मंदिर,मस्जिद भी कोइ काम जिन्हे बनाने की खातिर हमने बडे बडे जगंलो की कटाई है
वो भग्वान भी पतानही गंए कहा जीनके बना ने को मंदीर हमने आपस की लडाई है
आज आहाकार मचा दूनीया मे हर इन्सानो की सामत आइ है ना देखे मजहब प्रक्रती अब होनी दूनियाँ मे तबाही है
अगर खोल ली हमने आँखे तो साएद विध्वंस बच जाए गा जो भूल के मजहब जात धर्म को गीत प्रक्रती के गाएंगे, मानव जाति से खतरा तो ही हम टालपाएगे
सोचो दिल से हे मानव ईस धरती की नजरों मे होता मजहब खास नही अगर होता मजहब का कोई मोल तो धरती पे मचता यो कोहराम नही
अभी वक्त है सुधरने का ये जो ट्रेलर देखा है ना नुक्सान करो प्रक्रती का ये मिला सुधार का मोका है नही हूआ सुधार कोई तो विध्वंस पका हैं 

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