तुम्हारी परी



मुझे मत मरवाओ बाबुल प्यारे मैं मात को:ख से बोल रही 
मैं भी देखुं धरती अम्बर मेरे मन की आँखें बोल रही 
क्या क़ुसूर मेरा मैं पली को:ख मे जननी मॉ मुझे कोख में ही
क्यों मरवाने को बोल रही 

मुझे मत मरवाओ बाबुल प्यारे मैं मात को:ख से बोल रही 
जननी मॉ आभास करो तुमभी तो कभी बच्ची थी 
मेरी तरहा ही जीवन की डोर कभी तुम्हारी कच्ची थी
चुभाकर तुम देखो कॉटा कितना होता दर्द तुम्हें 
चली छुरीयॉ को:ख मे मुझपर हुई असहनीय पिडा मुझे 
जीते जी मेरे अंग कटवाए क्यो दर्द का  हुआ नही आभास तुम्हें 

मुझे मत मरवाओ बाबुल प्यारे मैं मात को:ख से बोल रही 
 बाहर झॉककर देखो बाबुल बेटी होती बोझ नही
जो बेटी को पत्थर बोले क्या लगती तुम्हें अफ़वाह नही 
मत मरवाओ को:ख मे बाबुल मुझको भी तो जीने दो 
मै भी बूलंदीया छुलूँगी मुझे दूध मात का पिनें दो 

मुझे मत मरवाओ बाबुल प्यारे मैं मात को:ख से बोल रही 
लटकी छुरी गर्दन पर मैं रोती बिलखती बोल रही 
रहम करो मेरे मात पिता मै मै भूर्ण को:ख मे खेल रही 
मुझे जन्म तो लेने दो बाबुल मै बनूँगी तुझपे बोझ नही
खिला दुगी मै चमन आँगन मे मुझे बाहर को:ख से आने दो

मुझे मत मरवाओ बाबुल प्यारे मै मात को:ख से बोल रही
रामरत्न सुडा मत पाप कमाओ बेटी को भी तो जीने दो
चमन होजाए धरती मॉ मेरे पॉव जमी पे टीकने दो 

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