इनसान की ईनसायत आई काम एक घरके चिराग को बूझने से बचालिया कहानी जो आपकी आँखे नम करदे


उन दिनों की बात है जब मै दसवीं कक्षा में पढा करता था बङे भाई के पास कपडे की दूकान थी भाई पास ही कै सहर मै दूकान चलाते थे मेरे स्कूल की छुट्टी के दीन भाई मुझे भी अपने साथ दूकान ले जाते सायद इसलिए की मै भी कूछ सिख जाउँ भाइ दिल के एकदम साफ ओर सभी पे  दयालू भाव रखते ओर हर किसी पै आंख मूंद कर भरोसा करलेते ओर ऊधार मे सामान दे-दे ते धिरे धिरे दो तीन  लाख रूपये की उधार होगई ओर पैसा एक भी वापस नही आता ओर उधार लेकर ग्राहक भी वापस नही आता अब तो सारा दीन ऐसे ही कुर्सी पर बैठे बैठे ही बिताना पडता दूकान बंद होने की कगार पर पहूंच ग ई लेकिन भाई को अभी भी अक्ल नही आई कोई एक दो ग्राहक दीन मे आते थोड़े भोत पैसे देते ओर अपने दू:ख की झूठी कहानी सूना कर उधार ले जाते ओर फिर दुबारा उस गली में  फिर कभी नजर भी नही आते हमारी दूकान के सामने ही मोटरसाइकिल के सामान की दूकान थी एक दीन वहा पर एक जवान सा लडका हेलमेट के आधे पैसे देकर आधे  की उधार रखवाकर आधे पैसे कल देजाने की बोलकर हेलमेट  लेजाने के लिए उस दूकानदार से बार बार विनती कर रहा था लेकीन दूकानदार ने साफ मना कर दीया साएद उसके पास हेलमेट लेने के पूरे पैसे नही थे ओर बाहर हाइवे पर बिना हेलमेट के पूलिस चालान  कर रही थी भाईसाब उस लङके  को जानते भी नही थे ओर उसे पैसे उधार देकर हेलमेट खरीद दीया उसने धन्यवाद बोला ओर पैैैसे  कल देकर जाने की बोलकर चलागया मूझे यह सब देख बहूत बुरा लगा क्यो की लाखों रूपये ठगा कर भी उसे जरा भी अक्ल नही आ रही थी दूकान  का दिन प्रती दीन दिवालिया निकलता जारहा था ओर वो अब भी जेब से पैसे उधार देे रहा था वो भी कीसी अनजान व्यक्ति को दूकान का सामान देता तब तक तो चलता पर जेब से पैसे उधार देना मुझे अच्छा निलगा ओर मै गुस्से मे बस इतना बोलकर बाहर चला गया देखता हूँ कल दीजिएगा या ये भी छूमंतर हो जाएगा
पन्द्रह बीस दीन बित ग ए पर वो नही आया मैने भाइ से पूछा भइ वो हेलमेट वाला पैैैसे देेेगया क्या भाइ ने बोला ना तो  फिर मुझे गुस्सा आने लगा ओर मैने कह दी या ओर कर लो भरोसा किसी पे ओर पूरी दूकान ही देेेदो किसी पे भरोसा करके लेकीन उसे कहा फर्क पड़ने वाला था, उसकी तो बस वहीं बात कीसी जरूरत मंद की मदद करनी चाहिए यही ईनसायत है इंसानियत से ज्यादा पैसो को महत्व नहीं देना चाहिए मैने भाई से कहा तो फिर आपके उधार के पैसे कोई देकर क्यों नहि जाता फिर क्या उसका तो बस वही जवाब क्या पता कोइ मजबूर हो ओर पैसे ना जूटापाए या कीसी ओर मजबूरी की वजह से ना आ पाए सब दे जाए गे पैसे कोइ नही रखता मैने भाई से फिर सवाल कर दीया तो फिर कोइ देकर क्यों नही जाते आपके पास जो आते है क्या वही सब मजबूर होते है ओर वो मोटर साइकिल वाला एक दीन की कहकर गया था वो भी नही आया मेरी सब बाते सुनकर भी उसका वही जवाब कीसी से सहयोग की उमीद होती है ना छोटे लोग उसी के पास जाते है लोग हमसे उम्मीद रखते है तभी तो आते है ओर कोइ आस करके आभी जाए तो उसे निराश नही करना चाहिए उसकी मदद करना हमारा फर्ज बनता है हम आपस मे सवाल जवाब कर ही रहे थे तभी वो बाइक वाला आही गया
मूह पे पट्टी सर पे हाथो पे पट्टी बांधे हुए मिठाई का डब्बा लिए हमारी दूकान के अन्दर आया ओर भाई को देख गले लग खुसी से झूमने लगा हमने पूछा ये पट्टियाँ क्यो बधि हूइ है ओर ये मिठाई का डब्बा किसलिए है मै इतना ही बोल पया आगे मै कूछ बोलता उस से पहले ही वो बोलपडा की मेरे घर पहूच ने से पहले ही मेरा एक्सिडेंट होगया था ओर ईस हेलमेट की वजह सै मेरी जिन बच गई अगर ये भाई साहब अगर मूझे उसदीन अगर पैसे उधार नही देते तो मै हेलमेट नही लेपाता ओर आज मेरे बच्चे अनाथ हो गये होते इस भाई साहेब ने मेरे बच्चो का सहारा छिनने से बचा  लिया ईतने दीन मै होस्पिटल मे था आज छुट्टी मिलते ही आपके पैसे देने ओरे मूह मिठा करवाने आया हूँ  यह सब सुनकर मेरी आँखे पानी से भर आई मै मन ही मन खुद को कोस रहा था अब मुझे समझ आग्या था ईन्सानयत से ज्यादा पैसा कोई माई ने नही रखता अगर उसदिन भाई साहेब उसकी मदद् नहि करते तो उन मासूमो की जिन्दगी तबाह हो चुकी होती उसके नन्हे नन्हे मासूम देख रहे होते पापा कब आएंगे और साएद उनके पापा कभी ना आ पाते


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