बहूजन समाज हिन्दू है आज यह साबित करदेगि यह कविता




हाँ मै हिन्दु हुं सोचा मेरे हिन्दु होने की एक पहचान लिखदु 
गले में लटका लूं हांडी गाँवों मे नंगे पेरों के निशान  लिख दूँ 
इन्सानों को नसीब नही है शुद्द पानी जिस पानी मे लोटे कुत्ते 
मुझे पीना है वो पानी सोचा उस गंदे नाले का नाम लिख दूँ 
शुद्र था शुद्र हूँ सोचा शुद्र होने कि पहचान लिख दूँ
हॉ मै हिन्दु हू सोचा मेरे हिन्दू होने की पहचान लिख दूँ 
उधेड़ूँ चमड़ा मर्त पसुओं का ओर ये पेसा सरेआम लिख दूँ 
छुता नही मुझे कोई उच्च वर्ण का ये भेद भाव चूप चाप सह लू 
हॉ मै हिन्दू हु सोचा मेरे हिन्दू होने की एक पहचान लिख दु
पढ़ना लिखना मेरा पाप है मंत्र सुनना महा पाप है सोचा ये इंसाफ़ लिख दूँ 
मै सेवा करूँ उच्च जाती कि ये ईश्वर का आह्वान है
मंदिर मे प्रवेश किया तो इश्वर का अपमान लिखदु 
 है बाहर गॉव से रहना मुझको मले कपड़ो में मेरी पहचान लिखदु 
हॉ मै हिन्दू हू सोचा मेरे हिन्दू होने कि एक पहचान लिखदु 
रामरत्न सुडा दिल रोता है मेरे पूर्वजों का हूआ वो अपमान लिखदु 
रोटी नसीब नही थी दो वक्त कि सोचा भुखे पेट के वो अरमान लिखदु 
रहना नंगे बदन वो बहन बेटी का ओर लुटती आबरू सरेआम लिख दूँ 
हॉ मै हिन्दू हू सोचा मेरे हिन्दु होने कि एक पहचान लिखदु 


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